भगवत गीता के उपदेश जीवन सफल बनाए | Geeta Updesh in hindi

महाभारत युद्ध लड़ने से मना कर रहा था अर्जुन तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया वह श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीमद्भगवद्गीता श्रीकृष्ण का हदय भी कहलाता है क्यों की श्रीमद्भगवद्गीता में जो भी भक्त ध्यान से पढ़ ले उसके सरे अंधकार अज्ञान को दूर करता है। गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। आज से लगभग 5560 वर्ष पहले गीता जी का ज्ञान बोला गया था। तभी तीनो लोको का टाइम रुक गया था। गीता की भासा संस्कृत है और इसके लेखक वेदव्यास है।

Geeta Updesh

गीता सार – Geeta Saar in Hindi

क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।

• जो हुआ, वह अच्छा हुआ, और जो हो रहा है, वह भी ही अच्छा होगा, तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।

• खाली हाथ आए और खाली हाथ चले जायेंगे। जो आज तुम्हारा है, वह कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।

परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षणमें तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।

• न ये शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है। और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो?

तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।

• जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।

भगवत गीता के उपदेश

भगवद गीता के ज्ञान से आपका जीवन बदल जायेगा। गीता में भगवन श्री कृष्णा कहते है की

“जो इस सृष्टि में जन्म लेता है वह निश्चित रूप से मृत्यु के अधीन है”

भगवत गीता का महत्व बताते हुए श्री कृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक जीव मृत्यु के अधीन है, चाहे मनुष्य हो, पशु हो, पक्षी हो या पौधा, प्रत्येक जीव अपने जन्म के साथ मृत्यु को लेकर ही आता है। प्रत्येक जीवित वस्तु को किसी न किसी स्थल पर या एक निश्चित समय पर मरना होता है, जब उसे अपने शरीर छोड़के जाना होता है।

“मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल की इच्छा मत करो।”

इस श्लोक के माध्यम से श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को फल की लालसा को छोड़कर अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार कर्म करना चाहिए और टाइम आने पर श्री कृष्ण अपने भक्तो को अचल फल देते ही है जो उनके हीत में होता है।

“इस जीवन में केवल शरीर मरते हैं लेकिन आत्मा अचल और अमर है।”

श्री कृष्ण कहते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है और न ही मरती है। वह आदि अनादि, अजन्मा अमर, सनातन और शुद्ध आनंदमय है। शरीर के मर जाने के बाद आत्मा शरीर के बहार निकल जाती है। और ुशी आत्मा की अपने कर्मो के अनुसार उनकी गति होती है यानि की फिर से जन्म होता है। यदि कोई मरता है, तो उसका पुनर्जन्म होता है, क्योंकि केवल शरीर मरता है, आत्मा कभी नहीं मरती।

आत्मा को न शस्त्र काट सकता है, और न अग्नि काट सकती है। और पानी पिघला नहीं सकती और हवा इसे सुखा नहीं सकती।

श्रीकृष्ण अर्जुन को समजाते हुए कहते है की मन शरीर का एक अदृश्य सूक्ष्म भाग है। यह दिखाई नहीं देता, फिर भी मन शरीर के सबसे बड़े तत्वों में से एक और सबसे तेज और ताकतवर है। यही पाखंड मन ही मनुष्य को कई तरा के पाप करने के लिए मजबूर करता है।

मन कई तरा के प्रलोभन का दीखता रहता है। और मन ही अपने नियंत्रण में रखता है। मन भी सदैव शरीर की ओर आकर्षित होता है और मन सुख-दुःख में उलझा रहता है।

श्री कृष्ण कहते हैं कि मानव शरीर घोड़ा है। जैसे आंख, कान, जीभ, नाक, त्वचा आदि… इन्हीं इंद्रियों से घोड़ों कोकहा है। और सारथी को मन कहा है। और हमारा मस्तिष्क भी है। उस रथ में विराजमान प्रभु हमारी आत्मा का मार्गदर्शन करते रहते की क्या सही है क्या सही नहीं हैं।

मानव मन निरंतर वस्तुओं की ओर आकर्षित होता है, और यह तब तक संभव है जब तक कि आत्मा अपने मन को नियंत्रित नहीं करता। यदि आप अपने मन की लगाम नहीं संभालेंगे तब तक मन आपको दुखों की और ही ले जायेगा। अपतु hame अपने मनको वस में करके प्रभु की ही भक्ति करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करनी चाहिए।

यदि आपका मस्तिष्क आपके जीवन का स्वामी है और आप उसके गुलाम हैं, तो यह आपको माया के बंधनों से बांधता रहता है। जब आप अपने मन को वश में करके उसका स्वामी बन जाते हैं, तो वही मन आपको मोक्ष की ओर ले जाता है।

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