पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा | Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha 2022

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा 2022 हिंदी पंचांग के अनुसार Pausha Putrada Ekadashi की तिथि 12 जनवरी को शाम 04:49 मिनट पर शुरू होकर 13 जनवरी को शाम में 7:32 मिनट पर समाप्त होगी।

Paush Putrada Ekadashi Vrat 13 जनवरी 2022 को पौष पुत्रदा एकादशी व्रत है। यह हर वर्ष पौष माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से वैवाहिक दंपत्तियों को दैवीय गुणों वाली संतान की प्राप्ति होती है। और पुत्र कामना करने वाली महिलाओं को पौष एकादशी व्रत करना चाहिए। साथ ही पुत्र पर आने वाले सभी कष्ट परेशानिया दूर हो जाते हैं। इस लिए एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है।

Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा! – Pausha Putrada Ekadashi

भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा रहा करता था। उसे कोई पुत्र नहीं था। और उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। उसे कोई संतान न होने के कारण सदैव चिंतित रहती थी। राजा के पितर भी सोचा करते थे कि इसके बाद हमको कौन पिंड देगा। राजा को भाई, बाँधव, धन, राज्य इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था।

वह सदैव यही सोचता रहता कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान करेगा। बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा। जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अँधेरा ही रहता है।

जिस मनुष्य ने पुत्र का मुख देखा है, वह धन्य है। उसको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं। पूर्व जन्म के कर्म से ही इस जन्म में पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं। राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता से व्याकुऱ होता था।

एक दिन राजा अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया तथा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने देखा कि वन में मृग, व्याघ्र, सूअर, सिंह, बंदर,सब भ्रमण कर रहे हैं। हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा है।

वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच-विचार में लग गया। इसी प्रकार आधा दिन बीत गया। वह सोचने लगा कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया फिर भी मुझको दु:ख प्राप्त हुआ क्यों?

राजा प्यास के मारे अत्यंत दु:खी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर फिरने लगा। थोड़ी दूरी पर राजा ने एक सरोवर देखा। उस सरोवर में कमल थे और सारस, हंस, मगरमच्छ आदि थे। उस सरोवर के चारों तरफ मुनियों के आश्रम बने हुए थे। उसी समय राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके बैठ गया।

राजा को देखकर मुनियों ने कहा – हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हारी क्या इच्छा है
राजा ने पूछा – महाराज आप कौन हैं, और किसलिए यहाँ आए हैं। कृपा करके बताइए।
मुनि कहने लगे कि हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं।

यह सुनकर राजा कहने लगा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए।

मुनि बोले – हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप अवश्य ही इसका व्रत करें, भगवान की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र का जन्म होगा।

मुनि के वचनों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी का ‍व्रत किया और द्वादशी को उसका पारण किया। इसके पश्चात मुनियों को प्रणाम करके महल में वापस चला गया गया। कुछ समय बीतने के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और 9 महीने के पश्चात उनके एक पुत्र हुआ। वह राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजापालक हुआ।

श्रीकृष्ण इस एकादसी का माहात्म्य समजाते हुए बोले: हे राजन! पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ता है या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

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