रामायण की सर्वश्रेष्ठ चौपाई | Ramayan Chaupai in Hindi

Ramayan Chaupai: हिन्दू धर्म में रामायण का विशिष्ठ स्थान हैं। रामायण का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हमारे सनातन धर्म रामायण में कुल लगभग २४,००० श्लोक है। हमारे हिन्दू धर्म रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जीवन चरित्र देखने को मिलता है।

रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि थे। रामायण में तुलसीदास की चौपाइयां मिलेंगी। इन रामायण चौपाई को यदि मनुष्य पढ़ ले तो उसका जीवन सफल है। रामायण की सर्वश्रेष्ठ चौपाई का विधिपूर्वक जाप करने पर जीवन की विभिन्न प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। रामायण की सर्वश्रेष्ठ चौपाई का वर्णन इस पोस्ट में देख सकते है।

Ramayan Chaupai

1. मंगल भवन अमंगल हारी

1. द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥

 

2. होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

 

3. हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी

 

आपद काल परखिये चारी॥3॥

 

4. जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू

सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू॥

 

5. हो, जाकी रही भावना जैसी

प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥

 

6. रघुकुल रीत सदा चली आई

प्राण जाए पर वचन न जाई॥

 

7. हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता

कहहि सुनहि बहुविधि सब संता॥

 

8. बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा।

सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥

अमिअ मूरिमय चूरन चारू।

समन सकल भव रुज परिवारू॥

 

9. सुकृति संभु तन बिमल बिभूती।

मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥

जन मन मंजु मुकुर मल हरनी।

किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥

 

10. श्री गुर पद नख मनि गन जोती।

सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू।

बड़े भाग उर आवइ जासू॥

 

11. उघरहिं बिमल बिलोचन ही के।

मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥

सूझहिं राम चरित मनि मानिक।

गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥

 

12. गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।

नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥

तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन।

बरनउँ राम चरित भव मोचन॥

 

13. बंदउँ प्रथम महीसुर चरना।

मोह जनित संसय सब हरना॥

सुजन समाज सकल गुन खानी।

करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥

 

14. बंदउँ प्रथम महीसुर चरना।

मोह जनित संसय सब हरना॥

सुजन समाज सकल गुन खानी।

करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥

 

15. तेज कृसानु रोष महिषेसा।

अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥

उदय केत सम हित सबही के।

कुंभकरन सम सोवत नीके॥

 

16. पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं।

जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥

बंदउँ खल जस सेष सरोषा।

सहस बदन बरनइ पर दोषा॥

 

17. भल अनभल निज निज करतूती।

लहत सुजस अपलोक बिभूती॥

सुधा सुधाकर सुरसरि साधू।

गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥ब्याधू॥

 

18. गुन अवगुन जानत सब कोई।

जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥

 

19. मृदुल मनोहर सुंदर गाता।

सहत दुसह बन आतप बाता॥

की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ।

नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥

 

20. देत लेत मन संक न धरई। 

बल अनुमान सदा हित करई॥

बिपति काल कर सतगुन नेहा।

श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥

 

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