हमारे शरीर में प्रमुख सात चक्र होते है और हरेक चक्र का महत्व जाने

7 Chakra in Hindi: हमारे शरीर में प्रमुख सात चक्र है। और हमारे सस्त्रो में लिखा है की मनुस्य जन्म दुर्लभ है बहोत जन्मो के बाद बहोत पुण्यो करने के बाद मनुस्य जन्म हमें मिलता है। क्यों की हम मनुस्य के अवतार में ही सभी अच्छे काम कर सकते है। और सभी जीवो में से मनुस्य को सर्वश्रेष्ठ बनाया है क्यों की मनुस्य जन्म ही मोक्ष का द्वार कहा जाता है।

हमारे शरीर की रचना बड़ी जटिल है हमारे शरीर में सात चक्र है। जिसके कारन हमे सभी तरा का सुख दुःख का अनुभव होता है। तो चलिए दोस्तों आज जानते है हमारे शरीर में प्रमुख सात चक्र के बारे में।

7 चक्र हमारे शरीर सूक्ष्म रूप से स्थित है और 7 चक्र आध्यात्मिक शक्तियों का केंद्र है। हमारे शरीर में 7 चक्र क्रमानुसार देखे तो पहला चक्र मूलाधार: आधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र ऐसे कुल ७ चक्र है।

7 Chakra in Hindi

सात चक्र | 7 Chakra in Hindi

  • मूलाधार चक्र
  • स्वाधिष्ठान चक्र
  • मणिपुर चक्र
  • अनाहत चक्र
  • विशुद्ध चक्र
  • आज्ञा चक्र
  • सहस्त्रार चक्र

1.मूलाधार: आधार चक्र

मूलाधार चक्र का मुख्या काम होता है हमें प्रवृत्ति, सुरक्षा, अस्तित्व का ज्ञान करता है। मूलाधार चक् केंद्र गुप्तांग और गुदा के बीच स्थित है। यह जनेनद्रिय और अधिवृक्क मज्जा से जुड़ा होता है और अस्तित्व जब खतरे में होता है तो मरने या मारने का दायित्व इसी का होता है।

इस क्षेत्र में एक मांसपेशी होती है जो यौन क्रिया में स्खलन को नियंत्रित करने में काम करती है। शुक्राणु और डिंब के बीच एक समानांतर रूपरेखा में कुंडलिनी बनके रहता है। मूलाधार लाल रंग और चार पंखुडि़यों वाला कमल होता है।

इसका मुख्य विषय काम—वासना, लालसा और सनक में निहित है। शारीरिक रूप से मूलाधार काम-वासना को, मानसिक रूप से उत्तेजित करता है, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख का आभास हमें मूलाधार चक् के बजे से ही होता है।

2.स्वाधिष्ठान चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र, अंडकोष या अंडाश्य के परस्पर के मेल से जो प्रजनन चक्र से जुड़ा हुवा होता है। स्वाधिष्ठान आमतौर पर मूत्र तंत्र और अधिवृक्क भी माना जाता है। स्वाधिष्ठान चक्र छह पंखुडि़यों का होता है। और उससे परस्पर जुड़ा नारंगी रंग का एक कमल होता है।

स्वाधिष्ठान का मुख्य विषय पे काम करता है वो है संबंध, हिंसा, व्यसनों और मौलिक भावनात्मक और सुख है। शारीरिक रूप से स्वाधिष्ठान, मा‍नसिक रूप से रचनात्मकता, भावनात्मक रूप से खुशी और आध्यात्मिक रूप से उत्सुकता को नियंत्रित रखता है।

3. मणिपूर चक्र

मणिपुर चक्र पाचन तंत्र से संबंधित है। और मणिपुर चक्र 10 पंखुडि़यों का एक कमल है। इसका स्थान नाभि में होता है। और ये पाचन में, शरीर के लिए खाद्य पदार्थों को ऊर्जा में रूपांतरित करता हैं।

मणिपुर चक्र का रंग पीला है। मुख्य मणिपूर द्वारा नियंत्रित होते हैं, ये निजी बल, भय, व्यग्रता, मत निर्माण, अंतर्मुखता और सहज या मौलिक से लेकर जटिल भावना तक के परिवर्तन. शारीरिक रूप से मणिपूर पाचन, मानसिक रूप से निजी बल, और भावनात्मक रूप से व्यापकता और आध्यात्मिक का केंद्र भी कहा जाता है।

4. अनाहत चक्र

अनाहत चक्र, हमारे सीने (ह्रदय) में स्थित होता है। अनाहत चक्र प्रतीक बारह पंखुड़ियों का एक कमल होता है। अनाहत हरे या गुलाबी रंग का होता है। अनाहत से जुड़े मुख्य विषय जटिल भावनाएं, करुणा, सहृदयता, समर्पित प्रेम, दया, संतुलन, अस्वीकृति और सबका कल्याण मंगल करना है।

5. विशुद्ध चक्र

विशुद्ध चक्र हमारे गले (कंठ) में होता है,विशुद्ध चक्र प्रतीक सोलह पंखुड़ियों का कमल है। विशुद्ध की पहचान हल्के या पीला या फिर नीले रंग का है। यह चक्र जागृत होने पर बोलने वाले में मिठास और बोलने में प्रभाव आ जाता है साधक जो बोलता है वो होने लगता है।

6. आज्ञा चक्र

आज्ञा चक्र को तृतीय नेत्र भी कहा जाता है। आज्ञा चक्र ठीक हमारे कपाल (ललाट) के बिच और चीटीदार ग्रंथि से जुड़ी होती है, जो अपनी अंतर्दृष्टि सूचना देती है। आज्ञा चक्र रोशनी के प्रति संवेदी ग्रंथि होती है जो हमारे अंदर मेलाटोनिन हर्मोन निर्माण करती है। और ये चक्र हमारे सोने या जागने की क्रिया को नियंत्रित करती है।

आज्ञा का प्रतीक दो पंखुडि़यों वाला कमल है और यह श्वेत, या गहरे नीले रंग का होता है। आज्ञा चक्र का मुख्य काम उच्च और निम्न अहम को संतुलित करना होता है और मानसिक रूप से, आज्ञा दृश्य चेतना के साथ जुड़ा हुवा होता है। भावनात्मक रूप से, आज्ञा चक्र शुद्धता के साथ सहज ज्ञान के स्तर से जुड़ा हुवा होता है।

7. सहस्रार चक्र

सहस्रार चक्र इसका प्रतीक कमल एक हजार पंखुडि़यां का होता हैं और यह सिर के शीर्ष पर स्थित होता है। सहस्रार बैंगनी रंग का प्रतिनिधित्व करता है और यह आतंरिक बुद्धि और दैहिक मृत्यु से जुड़ी हुयी होती है।

सहस्रार चक्र का आतंरिक स्वरूप कर्म के निर्मोचन से, दैहिक क्रिया ध्यान से, मानसिक क्रिया के साथ साथ सार्वभौमिक चेतना और एकता से और भावनात्मक क्रिया अस्तित्व से जुड़ा हुवा होता है। सहस्रार चक्र आत्मा का परमात्मा का मिलन होता है। यहाँ पे पहोच ने के बाद किसी भी साधक को कुछ भी प्राप्त करना सेस नहीं रहता है।

नोट: तो दोस्तों आप को समज में आ गया होगा की हमारे शरीर में प्रमुख सात चक्र होते है और ये चक्रो को जागृत करने के लिए हमें किसी गुरु की आवस्यकता होती है। कभी भी इसका ज्यादा ध्यान जो भी करे अपने गुरु की सला लेने के बाद ही करे क्यों की ये कुण्डलिनी जागृत करना जितना फायदेमंद है उतना उल्टा नुकशान भी हो सकता है।

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